Header Ad Banner

आधाराला असते काठी | मराठी गझल | वसंत शिंदे

वसंत शिंदे मराठी गझल, मराठी गझल, shinde gazal
            
            मात्रावृत, वृत्त = विद्युन्माला / पादाकुलक
            लगावली = गागागागा गागागागा

            आधाराला असते काठी
            कुणीच नसतो कोणासाठी.

            पीळ तरीही सुटून जातो
            किती मारल्या कसून गाठी.

            बुद्धी जेव्हा थकून जाते
            कपाळावरी येते आठी.

            आयुष्याला कळले नाही
            कुणी लादले ओझे पाठी.

            साप तुझा तो नको दाखवू
            माझ्या हाती आहे लाठी.

            अजून आहे यौवनात मी
            येवू दे आली तर साठी.

            - वसंत शिंदे, सातारा.
              मो.नं. ९९२२७७६०२७

टिप्पणी पोस्ट करा

0 टिप्पण्या

🌙