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चिक्कू | बालकविता | दशरथ कांबळे

चिक्कू - बालकविता, चिक्कूची मराठी कविता
 

            ये तायडे ऐक ना गं जरा
            आणू चल विकत चिक्कू बारा,
            रसरशीत पिकलेत, सुगंध सुटला सारा
            चल जाऊन आणू तुझा आवर पसारा.

            हातातले काम तुझ्या ठेव जरा बाजूला
            ताजे ताजे आलेत गं चिक्कू विकायला,
            गल्ला माझा फोडून मी पैसे घेते मोजायला
            गल्ली सारी जमलेय चिक्कू विकत घ्यायला.

            चिक्कू संपायच्या आधी चल लवकर जाऊ
            मस्त मस्त पिकलेले चिक्कू आपण घेऊ,
            आई बाबा येण्याआधी बसून आपण खाऊ
            गोड गोड चिक्कू खाऊन ढेकर दोघी देऊ.

            - दशरथ (आण्णा) कांबळे
            चंदगड, कोल्हापूर

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