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किलबिल | बालकविता | दशरथ कांबळे

किलबिल , Kilbil Kavita, Balkavita

            किलबिल किलबिल
            जेव्हा झाडावर होते,
            तेव्हा आमच्या बाब्याला
            सकाळी जाग येते.

            रोज सकाळी उठून
            अंगणात जातो,
            पक्ष्यांच्या किलबिलात
            धुंद होऊन जातो.

            म्हणतो कसा, आई बाबा
            आवाज मला यांचा आवडतो,
            हे कसे एकजुटीने राहतात
            तसेच मी पण मित्र जोडतो.

            किती गं संदेश
            छान हे देतात,
            सकाळी लवकर उठून
            कामाची चर्चा करतात...

            - दशरथ कांबळे
            चंदगड, कोल्हापूर



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