Header Ad Banner

नभी पाखराला । निशिकांत देशपांडे । मराठी गझल

nabhi pakharala, marathi gazal,

        नभी पाखराला

        वृत्त : भुजंगप्रयात
        लगावली : लगागा X ४

        उगा बंधने घालता का मनाला?
        उडू ऊंच द्या ना! नभी पाखराला. 

        कधी भेटते का गगन भूतलाला?
        तरी ओढ क्षितिजा! तुझी मानवाला. 

        सलोखा कराया अहं आड येतो
        दुरावा जरी काचतो आपणाला. 

        गळा फास बांधून मुक्ती मिळाली
        किती आळवू वांझ काळ्या नभाला?. 

        ठरवतो जमाना कसे मी जगावे
        तरी दर्पणी पाहतो मी स्वतःला. 

        कुठे शेत माझे मलाही न ठावे
        तरी सात बार्‍यात नोंदी कशाला?. 

        करायास सारथ्य घे कासरा तू
        सुदर्शन नको, धीर दे अर्जुनाला. 

        लिहू काय गाथेत मी जीवनाच्या?
        घराणे न मजकूर शब्दांकण्याला. 

        तुझी सांग "निशिकांत" व्याख्या सुखाची"
        न मिळते कधी जे असोनी उशाला". 

      - निशिकांत देशपांडे, पुणे.
        मो.क्र. ९८९०७ ९९०२३

टिप्पणी पोस्ट करा

0 टिप्पण्या

🌙